सन 1998 में सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब ने रामपुर में एक संस्कृत संभाषण वर्ग का आयोजन किया था। उसमें आचार्य गजेंद्र कुमार पंडा जी तशरीफ़ लाए थे। वह तब तक 6 गोल्ड मेडल पा चुके थे और एक प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे। वेदांत में उन्होंने पी. एचडी. की थी। रामपुर में उनके रहने का इंतेज़ाम जमाअते इस्लामी के ज़िम्मेदार डा. इब्ने फ़रीद साहब के घर था और उनके खाने का इंतेज़ाम सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब के घर। उन्हें रामपुर आने से बहुत डराया गया था कि वहां जाओगे तो मुसलमान आपको मार देंगे लेकिन फिर भी वह आ गए थे।
हम उनसे मिलने रामपुर गए और फिर उनकी प्रतिभा देखी तो हमने भी उन्हें अपने शहर में बुलाया। उनके साथ रामपुर से सैयद अब्दुल्लाह तारिक़ साहब भी तशरीफ़ लाए थे। पहले दिन उनका हम सभी ने बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया।
यह फ़ोटो उसी पहले दिन का है। फ़ोटो के पीछे 2 जून 1998 लिखा है।
इस वर्ग का आयोजन हमने जैन इंटर कॉलिज में किया था लेकिन ताज्जुब की बात है कि सीखने वालों में हिंदू भाई केवल 3 थे। इसमें मुस्लिम लड़कियों ने भी बड़ी तादाद में हिस्सा लिया था और लड़कों में भी ज़्यादा मदरसे के तालिब इल्म थे। इन सबने ही आचार्य श्री पंडा जी को जो आदर सम्मान दिया, उससे पंडा जी बहुत अभिभूत हुए और हक़ीक़त यह है कि पंडा जी के रूप में हमने भी एक ऐसे इंसान को देखा जो बिल्कुल बच्चों की तरह मासूम है। ज्ञान, निश्छलता और सादगी से भरे पूरे आचार्य पंडा जी से मिलना अपने आप में एक आनंद देता है। ‘हास-परिहास‘ का सेंस भी उनमें ग़ज़ब का है।
हिंदी और अंग्रेज़ी में एक वचन और बहुवचन ही होता है जबकि संस्कृत में द्विवचन भी होता है।
उन्होंने अपने कोर्स को ऐसे डिज़ायन किया है कि उसमें से द्विवचन को हटा दिया है ताकि शुरू में सीखने वालों को आसानी हो सके। उनकी क्लास में हंसी के ठहाके छूटते रहते हैं और इसी तरह हंसी मज़ाक़ के दौरान मात्र 10 घंटों में ही वह आदमी को संस्कृत बोलने के लायक़ बना देते हैं। दसवें दिन वर्ग में सीखने वाले लड़के लड़कियों ने संस्कृत में भाषण देकर पूरे शहर को चौंका दिया था।
शहर भर के हिंदू मुस्लिम वर्ग का सहयोग इस कार्यक्रम को मिला और सभी को एक अच्छा संदेश मिला।
रामपुर में उन्होंने बताया कि हमारे पिताजी शुद्ध नैष्ठिक ब्राह्मण हैं। अगर उन्हें पता चला कि हम मुसलमानों के घर खा पी कर आ रहे हैं तो वह हमें घर में घुसने ही नहीं देंगे।
उन्हें शुद्ध खाने में शाकाहारी भोज दिया गया।
दो दिन बाद वह बोले कि ‘मछली बनवाओ।‘
उनके भोजन का इंतेज़ाम सैयद साहब के घर पर था। उन्होंने उनके लिए मछली बनवाई, उन्होंने उसे खाया।
हम समझे कि वह मांसाहारी हैं। अगले दिन उनके लिए मुर्ग़ा बनवाया गया।
उसे देखकर उन्होंने खाने से इंकार कर दिया।
बोले हम मांस नहीं खाते।
उन्हें याद दिलाया गया कि कल आपने मछली खाई थी न।
बोले कि हां, लेकिन मछली को तो हम आलू की तरह मानते हैं।
भारत में भी अलग अलग इलाक़े के शाकाहारियों के भोजन का मेन्यू अलग अलग है।
भारत में ही नहीं विदेशों में भी ऐसा ही है। जापान में भी मछली को शाकाहारी भोजन में ही गिना जाता है।
ब्लॉगर रचना बैंकॉक गईं तो उन्होंने खाने के लिए वेज बर्गर मंगाया। मैक्डोनल्ड ने उन्हें बीफ़ बर्गर दिया। वहां गाय का मांस शाकाहार ही माना जाता है।
भारतीय संस्कृति की तरह ही विश्व संस्कृति भी बड़ी अद्भुत है।
यह जानना सचमुच एक अजीब बात है कि मांस उन लोगों के भोजन का भी हिस्सा है जो कि शाकाहारी हैं और शाकाहार की प्रेरणा देते हैं।
शाकाहार क्या है ?
लोग इस पर भी एकमत नहीं हैं।
